October 12, 2026
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धर्मपुर की गरीब नवाज मस्जिद के दारुल उलूम में पांच नौनिहालों ने पूरा किया हिफ्ज-ए-कुरआन, उलमा-ए-कराम ने दी मुबारकबाद

पुरवकार महफिल का आयोजन, हिफ्ज-ए-कुरआन की फजीलत और वालिदैन के मकाम पर उलमा-ए-कराम का ईमान अफरोज खिताब

समस्तीपुर, 5 अक्टूबर। (जावेद अशरफ) शहर के धर्मपुर स्थित गरीब नवाज मस्जिद के दारुल उलूम में पांच नौनिहालों के हिफ्ज-ए-कुरआन मुकम्मल करने के अवसर पर एक पुरवकार महफिल-ए-तकमीले हिफ्ज-ए-कुरआन का आयोजन किया गया। इसमें सैकड़ों लोगों ने शिरकत की। इस मौके पर नौनिहालों की हौसला अफजाई की गई और उनके रोशन मुस्तकबिल के लिए दुआएं मांगी गईं।

महफिल की सदारत हजरत अल्लामा मौलाना कारी मुहम्मद मतिउर्रहमान अशरफी मिस्बाही, बानी दारुल उलूम तैगिया मोइनुल उलूम, नामनगर, समस्तीपुर ने फरमाई। जबकि मुक़र्रिर-ए-शोलाबयां हजरत अल्लामा मौलाना गुलाम जिलानी बरकाती ने अपने पुरअसर और ईमानअफरोज खिताब में हिफ्ज-ए-कुरआन-ए-करीम की फजीलत, अजमत और बरकात पर तफसील से रोशनी डाली।

मौलाना गुलाम जिलानी बरकाती ने अपने खिताब में फरमाया कि कुरआन-ए-करीम को अपने सीने में महफूज करना बहुत बड़ी सआदत और अल्लाह तआला की अजीम नेमत है। कम उम्र में कुरआन-ए-करीम के तीस पारे हिफ्ज कर लेना बच्चे की मेहनत, असातिजा की लगन और वालिदैन की कुर्बानियों का समर है। उन्होंने कहा कि हाफिज-ए-कुरआन के वालिदैन के लिए भी बड़ी फजीलत बयान की गई है और रोज-ए-कयामत उन्हें एजाज व इकराम से नवाजे जाने की बशारत दी गई है। उन्होंने नौनिहालों को कुरआन-ए-करीम की तालीमात पर अमल करने और अपनी जिंदगी को उसके अहकाम के मुताबिक ढालने की तलकीन की।

हिफ्ज-ए-कुरआन-ए-करीम मुकम्मल करने वाले नौनिहालों में मुहम्मद शमशीर रजा वल्द मुहम्मद मोइनुद्दीन, मुहम्मद समीर वल्द मुहम्मद रहमत अली, मुहम्मद अब्दुल्लाह अली वल्द मुहम्मद अजमत अली, मुहम्मद हुसैन वल्द मुहम्मद मुस्तकीम और मुहम्मद मुदस्सिर वल्द शकील अहमद शामिल हैं।

इस मौके पर दारुल उलूम के नाजिम-ए-आला हजरत हाफिज व कारी मौलाना मोइन साहब की मेहनत, लगन और दीनी खिदमात को भी खूब सराहा गया। शिरकत करने वाले लोगों ने कहा कि मौलाना मोइन साहब गरीब नवाज मस्जिद के इमाम की हैसियत से अपनी जिम्मेदारियां अदा करने के साथ दारुल उलूम की तालीमी तरक्की, खुशहाली और नौनिहालों की दीनी तरबियत के लिए लगातार कोशां हैं। बच्चों को पाबंदी और दिलजमी के साथ कुरआन-ए-करीम की तालीम देना उनकी काबिल-ए-कद्र खिदमात में शामिल है। हाजरीन ने उनकी कोशिशों को सराहते हुए उन्हें भी मुबारकबाद पेश की।

उलमा-ए-कराम ने कहा कि तकरीबन दस बरस की उम्र में कुरआन-ए-करीम के तीस पारे अपने सीने में महफूज कर लेना बड़ी सआदत है। ऐसे बच्चों की हौसला अफजाई करना और दीनी तालीम के फरोग में तआवुन करना समाज की अहम जिम्मेदारी है।

आखिर में बारगाह-ए-रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में सलातो-सलाम का नजराना पेश किया गया और मुल्क व मिल्लत की सलामती, उम्मत-ए-मुस्लिमा की खुशहाली और तमाम हाजरीन के लिए खास दुआएं मांगी गईं। इसी के साथ महफिल का इख्तिताम हुआ।

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