|
Getting your Trinity Audio player ready...
|


कुरान-हदीस की सीख से लेकर हंसी-ठिठोली तक—धार्मिक आयोजनों के बदलते स्वरूप पर उठे सवाल, समाज सुधार के असली मकसद पर मंथन जरूरी
जिला संवाददाता : मोहम्मद जुबैर
समस्तीपुर। धार्मिक जलसे समाज को सही राह दिखाने, बुराइयों से बचाने और कुरान-हदीस की शिक्षाओं को आम लोगों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। लेकिन बदलते दौर में इन आयोजनों के स्वरूप को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वारिसनगर क्षेत्र के एक गांव में आयोजित धार्मिक जलसे का वायरल वीडियो इसी बहस को फिर सामने ले आया है।
वायरल वीडियो में झारखंडी बाबा के नाम से चर्चित और खुद को इस्लामिक स्कॉलर बताने वाले एक वक्ता को लोगों को संबोधित करते देखा जा रहा है। उनके बोलने के अंदाज और कुछ बातों पर लोगों को हंसते व तालियां बजाते देखा जा सकता है। वीडियो के पूरे संदर्भ और पूरे कार्यक्रम की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, इसलिए किसी व्यक्ति या आयोजन पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। हालांकि वीडियो ने धार्मिक मंचों के उद्देश्य को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है।
कार्यक्रम में बाहर से आए कुछ कवि और वक्ताओं के शामिल होने की भी चर्चा है। ऐसे में मूल सवाल यह है कि धार्मिक मंच से होने वाली हर प्रस्तुति लोगों के दिल और व्यवहार में क्या बदलाव ला रही है? क्या लोग नशे से दूर हो रहे हैं, नमाज की पाबंदी बढ़ रही है, माता-पिता की सेवा का जज्बा पैदा हो रहा है और गरीबों की मदद के लिए लोग आगे आ रहे हैं?
धार्मिक आयोजन पर खर्च होने वाली बड़ी रकम को लेकर भी समाज में विचार की जरूरत है। यदि किसी जलसे के साथ गरीब बच्चों की पढ़ाई, जरूरतमंदों के इलाज, बेटियों की शादी या गरीब परिवारों की मदद जैसी पहल जुड़ जाए तो धार्मिक संदेश का असर कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।
धार्मिक कार्यक्रम में मनोरंजन बिल्कुल न हो, ऐसा कहना उद्देश्य नहीं है। लेकिन जब मनोरंजन मूल धार्मिक और सुधारात्मक संदेश पर भारी पड़ने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। सोशल मीडिया के दौर में वायरल होना सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। असली सफलता तब होगी जब जलसे से लौटने वाला व्यक्ति अपनी किसी बुराई को छोड़ने और किसी अच्छे काम को अपनाने का संकल्प लेकर जाए।
युवाओं के लिए ऐसे मंचों की जिम्मेदारी और भी बड़ी है। उन्हें शिक्षा, रोजगार, नशामुक्ति, अच्छे चरित्र, माता-पिता के सम्मान, भाईचारे और इंसानियत का संदेश मिलना चाहिए। धार्मिक मंच से निकली बात सिर्फ तालियों तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों की जिंदगी तक पहुंचे—यही किसी भी सुधार कार्यक्रम की असली कसौटी होनी चाहिए।
आखिर फैसला समाज को करना है—धार्मिक जलसे से हमें सिर्फ कुछ घंटों की हंसी और तालियां चाहिए या ऐसी सीख, जो पूरी जिंदगी इंसान के साथ रहे?
